वैक्सीन के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता,केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया हलफ़नामा

वैक्सीन के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता,केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया हलफ़नामा

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दिव्यांगों से जुड़ी एक याचिका पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल करके कहा है कि ‘केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय’ द्वारा जारी की गई कोविड टीकाकरण गाइडलाइंस के अनुसार “किसी भो व्यक्ति को उसकी मर्ज़ी अथवा सहमति के बिना कोविड टीकाकरण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”
देश में दिव्यांग व्यक्तियों को टीकाकरण प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने से छूट देने के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि “उसने (केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय) ऐसी कोई SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) जारी नहीं की है जिस में किसी भी उद्देश्य के लिए कोविड टीकाकरण प्रमाण पत्र साथ रखना अनिवार्य हो।”

केंद्र सरकार ने यें बातें एक ग़ैर सरकारी संगठन की याचिका के जवाब में दाख़िल किये हलफ़नामे में कहीं। याचिका में NGO ने दिव्यांग जनों का घर घर जाकर टीकाकरण करने की माँग की गई है। हलफ़नामे में केंद्र ने कहा है कि “महामारी के मद्देनज़र जनहित में कोरोना टीकाकरण किया जा रहा है, विभिन्न प्रिंट व इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से यह सलाह और विज्ञापन दिए गए हैं कि… सभी नागरिकों को कोरोना का टीकाकरण कराना चाहिये और इसके लिए व्यवस्था और प्रक्रिया निर्धारित की गई है।”

वहीं सुप्रीम कोर्ट में ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि “एक अप्रैल-2020 से 11 जनवरी-2022 तक 1,47492 बच्चों ने कोविड या दूसरे कारणों से अपने माता या पिता अथवा दोनों को खो दिया है। माता-पिता को खोने देने के वाले इन बच्चों को देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता सम्बन्धी स्वत: संज्ञान मामले में NCPCR (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) ने अधिवक्ता स्वरूपमा चतुर्वेदी के माध्यम से दाख़िल अपने हलफ़नामे में बताया कि “यें आंकड़े राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा उनके ‘बाल स्वराज पोर्टल,कोविड केयर’ पर अपलोड सूचना पर आधारित हैं।”

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ के अनुसार “इन में 10,094 बच्चे पूरी तरह से अनाथ हो गए हैं। और कुल 1,36,492 बच्चों ने अपने माता या पिता में से एक को खो दिया है और 488 बच्चें ऐसे हैं जिन्हें लावारिस छोड़ दिया गया है।” आयोग ने लैंगिक आधार पर बताया कि “इन में 76,508 लड़के, 70,980 लड़कियां व 4 ट्रांसजेंडर हैं। इन में 59,010 बच्चे 08 से 13 वर्ष आयु वर्ग के, 22,763 बच्चे 14 से 15 साल आयु वर्ग के, 22,626 बच्चे 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग के और 26,080 बच्चे 4 से 7 वर्ष आयु वर्ग के हैं।”

सुप्रीम कोर्ट में ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ ऐसे बच्चों का राज्यवार विवरण देते हुए कहा कि “इन में सब से ज़्यादा बच्चे ओडिसा में 24,405, महाराष्ट्र में 19,623 बच्चे, गुजरात मे 14,770 बच्चे, तमिलनाडु में 11,014 बच्चे, उत्तर प्रदेश में 9,247 बच्चे, आंध्रप्रदेश में 8,760, मध्यप्रदेश में 7,340 बच्चे, प. बंगाल में 6,835 बच्चे, दिल्ली में 6,629 बच्चे तथा राजस्थान में 6,827 हैं। NCPCR (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) ने यह भी कहा है कि “वह यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक क़दम उठा रहा है कि इस कोविड महामारी के दौरान बच्चे बिल्कुल भी प्रभावित न हों अथवा कम से कम ही प्रभावित हों।”

Author: Desh Duniya Today [Farhad Pundir]