युवा साहित्यकार: विपुल माहेश्वरी ‘अनुरागी’ का नया लेख ‘मेरा कमरा जल्द बदल जायेगा’- Vipul Maheshwari

युवा साहित्यकार: विपुल माहेश्वरी ‘अनुरागी’ का नया लेख ‘मेरा कमरा जल्द बदल जायेगा’– Vipul Maheshwari

मेरा कमरा जल्द बदल जायेगा-
आज मुझे घर के अन्दर वाले कमरे में रहने की भरपूर इज़ाजत है।क्योंकि मैं घर का बड़ा हूँ और बेटा भी हूँ।
मुझे बहुत प्यार किया जाता है और मेरा ख़्याल भी रख लिया जाता है क्योंकि मैं सबकी ख़्वाहिशों का अदब करता हूँ। मेरी उम्र के साथ साथ झुर्रियां आनी शुरू हो रही है।
मैं थोड़ा सा शरीर से असहज महसूस करने लगा हूँ , शायद
कभी-कभी कमर दर्द की तक़लीफ़ तो कभी-कभी सालों पहले लगी कुछ चोट अब हड्डियों की कमज़ोरी की वजह से
दु:ख देने लगी है। उम्र के साथ-साथ सर दर्द बढ़ गया है, तनाव सबकी ख़्वाहिशों का निर्वहन करने की ललक और
ज़िम्मेदारी का आभास है । मैं कोई एकलौता आदमी नहीं हूँ जो इस अवस्था से गुज़र रहा हूँ। मेरा ‘बाप’ अभी 2 साल पहले ही अपने शरीर को तहा तहा कर उसका मलवा बनवा कर ये दुनियां हम लोगो को अपना सब कुछ सौप कर चला गया है । तो मुझे इस बात का तो अहसास है कि आने वाला
दौर समय क्या लेकर आने वाला है ।
बच्चे मेरे भी बड़े हो रहे है उनकी छोटी बड़ी ख़्वाहिश के लिए पत्नी हर रोज़ और मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है । ‘माँ’ की कड़क आवाज़ अब धीमे स्वर की ओर बढ़ रही है। कल तक मैं घर का खिला हुआ फूल था और मैं ही गुलशन को गुलफ़ाम किये हुए था। अब धीरे-धीरे मेरा कच्चा ख़ून अब पक्की कलाइयों में प्रवाहित होकर पेड़ बनने वाला होगा।
मैं धीरे-धीरे अपने अन्दर वाले कमरे को उनकी ‘माँ’ और उनके लिए छोड़ने जा रहा था। अभी ‘माँ’ बाहर वाले कमरे
तक सीमित थी और मैं खिसक कर ड्रॉइंग रूम तक पहुँचने ही वाला था।
अब बच्चों के दोस्त आने शुरु हो गए थे तो अब मेरी धर्म पत्नी भी धीरे-धीरे मेरे कमरे यानी कि ड्रॉइंग रूम की तरफ़ बढ़ रही थी। और हम दोनों ने एक बैड पर सोने की बजाये उन्हें दो  पिलंग कह दो या खाट या फोल्डिंग अपने लिये डाल लिये थे। मैंने शाम को अब थोड़ा और देर से आना शुरू कर दिया था। क्योंकि मुझे अब और कमाने की ज़रूरत आन पड़ी थी।
धीरे-धीरे मेरे घर में अब खिलौने कम और मेरे बच्चो के मित्र आने शुरू हो गए थे इसलिए अब ड्रॉइंग रूम भी हमें छोड़ना पड़ गया था। हमने एक रैक में कपड़े लगा दिये थे और बाहर  गैलरी में अपना आशियाना बना लिया था ।
सुबह नहाने के लिये वहीं से कपड़े उठा लिया करते थे और फ़िर गैलरी में बैठ जाया करते थे।  अब बच्चे बड़े हो गये थे। ‘माँ’ वाला कमरा अब मेरी पत्नी ने ले लिया था और मैं जस का तस वही गैलरी में रहता रहा। कब अन्दर वाले कमरे से शुरु हुआ सफ़र गैलरी तक आ पहुँचा था? मुझे पता ही नही चला। आज शायद 35 की उम्र में अपने 50 की कहानी लिख रहा हूँ तो थोड़ा भावुक भी हूँ । ख़ैर जाने कल क्या हो…?
इंजी. विपुल माहेश्वरी ‘अनुरागी’
सहारनपुर9627103121

Vipul Maheshvari
युवा साहित्यकार- विपुल माहेश्वरी ‘अनुरागी’

 

Author: Desh Duniya Today [Farhad Pundir]